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जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है

सामान्य

कुछ अरमान इस दिल के,
तन्हा जीवन से तन्हाई मिटाने के ख़्वाब,
कुछ चाहत उसे पाने की,
थोड़ी आरज़ू उसमे खो जाने की,
कितने हसीन हैं यह सब |

लेकिन साथ है डर इन सबके खो जाने का,
उससे दूर हो जाने का,
जानता नहीं क्या होगा आगे,
पर सोच रूकती कहाँ है, जाती है भागे,
इस रफ़्तार से की पकड़ना मुश्किल है,
उसके साथ चलता तो हूँ
शायद “साथ” में उसके होने की चाहत है,
जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है |

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चाहत

सामान्य

मजबूरी और बेबसी का जो है आलम,
निजात उससे पाने की चाहत है,
इंसानों को अब इंसानियत की है ज़रुरत,
बस उनको यह समझाने की चाहत है |

की चाहतें तो हजारों पाल बैठे हैं,
पर न पता किस चाहत की हमसे क्या चाहत है,
की भूल बैठे ज़माना खुशियों का,
न जाने ग़मों को हमसे इतनी क्या चाहत है ||

चाहते तो हम भी थे चाहतों की हद्द तक,
पर न जाने क्यूँ चाहतों को हदों में सिमटने की चाहत है,
शर्माने से रोका काफी बार इन चाहतों को,
न जाने क्यूँ इन्हें सिमट जाने की चाहत है |