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नाराज़गी

सामान्य

ज़िंदगी से रंजिश है मेरी,

क्यों है न जानता हूँ मैं,

खुशी आती है पल भर के लिए,

बैठती ही नहीं है साथ मेरे,

न जाने किस बात की नाराज़गी है,

न समझ पाता हूँ मैं !!!

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सब कुछ बेगाना हो गया है!!

सामान्य

धोका खाकर दिल बेसहारा हो गया है,
दुश्मन ना था कोई पर हर कोई अब रंजिश में हो गया है;
सोचता हूँ के क्या बुरा किया था मैंने,
की अपनों में ही सब कुछ बेगाना हो गया है!!

सिर्फ़ है तेरा आसरा – 1st July 2008 2:11 PM (Pune)

सामान्य

कैसा यह आलम है, बेबस हूँ मैं,
न वोह कुछ बोलते हैं, न दिल कुछ सुनता है,
पता नहीं यह हवाएं यूँ क्यूँ बह रही हैं,
आवाजें तो बहुत हैं, पर बेचैनीयां बड़ रही है!


कौन कहता है की बिना कहे लोग बात समझ जाते हैं,
जो अपने होते हैं, वोह हर राज़ ख़ुद जान जातें हैं,
मैं तो बोलता रहता हूँ, कोई समझ नहीं पाता,
जो पास होते हैं वोह भी दूर हो जाते हैं!!


अब तू ही बता मेरी जिंदगी के मालिक,
क्या करुँ ऐसा की तू खुश हो जाए,
आवाज़ दे रहा है मेरे जिस्म का हर कतरा,
कुछ तो बोल, बस सिर्फ़ है तेरा आसरा!!!