Category Archives: कविता

तन्हाई

सामान्य

चारों और के अंधियारे में

जब मैं छत पर बैठा था अकेला,

दूर तक निहारने कि कोशिश कर रहा था ,

तभी मुझे लगा मेरी आत्मा मुझसे अलग हो

मेरे पास आ बैठी है ,

मेरी तन्हाई में अपने को शामिल करने ,

और शायद कुछ कहने !

जैसे ही वह हुई कुछ कहने ,

कहीं दूर किसी ने एक दीप जला दिया ,

यह सोच कि सुबह के सूरज कि

पहली किरण आ पड़ी है ,

वह मेरे भीतर समां गयी ,

मुझको वहीं छोड़ ,

मेरी तन्हाई में !!

# यह कविता मैने १७ मार्च २००२ को आगरा में खतैना रोड वाले घर में लिखी थी तकरीबन रात को १:२५ प्रात: बजे।

Advertisements

चाहत

सामान्य

मजबूरी और बेबसी का जो है आलम,
निजात उससे पाने की चाहत है,
इंसानों को अब इंसानियत की है ज़रुरत,
बस उनको यह समझाने की चाहत है |

की चाहतें तो हजारों पाल बैठे हैं,
पर न पता किस चाहत की हमसे क्या चाहत है,
की भूल बैठे ज़माना खुशियों का,
न जाने ग़मों को हमसे इतनी क्या चाहत है ||

चाहते तो हम भी थे चाहतों की हद्द तक,
पर न जाने क्यूँ चाहतों को हदों में सिमटने की चाहत है,
शर्माने से रोका काफी बार इन चाहतों को,
न जाने क्यूँ इन्हें सिमट जाने की चाहत है |

होली

सामान्य

#एक कविता होली के अव्सर पर! लिखे हुए तो काफ़ी समय हो गया, कई साल बीत गए हैं पर दिल में हर साल यही कामना रहती है। क्या जानने के लिएँ पढ़ें यह कविता:-

रंगों के इस पावन पर्व पर,
आओ अपने जीवन में रंग नए बिखेरें हम,
और जीवन के आँगन में रंगोली एक बनाएं,
करें कामना यह की
जीवन हमारा सदैव ही रंगों की तरह मुस्कुराता रहे,
और ‘पलक’ कभी ग़म के आंसूओं से न भीगे!