Category Archives: आत्मीयता

With Love to Srishti

सामान्य

आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

छोटी सी थी तुम अब से कुछ दिन पहले तक,
जब छोटी सी बात पर चिन्ता होती थी तुम्हरी,
कहाँ गयी हो या कहाँ हो,
सोच कर हर पल व्याकुलता होती थी,
लेकिन आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

तुम इतनी जल्दी बड़ी होगी,
अन्दाज़ा ना था,
सोचा भी नहीं था,
छोटी सी गुड़िया सी थीं तुम,
जिसे देखकर बड़े होने का एहसास होता था,
लेकिन आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

कुछ दिन रहीं जो तुम साथ में,
बहुत मज़ा आया,
खुश तो आज बहुत हम भी हैं,
दिल में दुआयें बहुत हैं,
मन्न है लेकिन थोड़ा घबराया,
कि आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

Advertisements

तन्हाई

सामान्य

चारों और के अंधियारे में

जब मैं छत पर बैठा था अकेला,

दूर तक निहारने कि कोशिश कर रहा था ,

तभी मुझे लगा मेरी आत्मा मुझसे अलग हो

मेरे पास आ बैठी है ,

मेरी तन्हाई में अपने को शामिल करने ,

और शायद कुछ कहने !

जैसे ही वह हुई कुछ कहने ,

कहीं दूर किसी ने एक दीप जला दिया ,

यह सोच कि सुबह के सूरज कि

पहली किरण आ पड़ी है ,

वह मेरे भीतर समां गयी ,

मुझको वहीं छोड़ ,

मेरी तन्हाई में !!

# यह कविता मैने १७ मार्च २००२ को आगरा में खतैना रोड वाले घर में लिखी थी तकरीबन रात को १:२५ प्रात: बजे।

कब होगा यह सच, या कभी नहीं?

सामान्य

कब से अरमान ज़िन्दगी के जगा रहा हूँ,
कब से उसे मैं बिन रुके बुला रहा हूँ,
कब से इंतज़ार है उसके आने का,
कब से विचार है उसमें डूब जाने का,
कब से आरज़ू है उसकी आवाज़ में खो जाने की,
कब से चाहत है उसकी चाहत को अपना बनाने की,
कब तक यह रहेगा एक सपना,
कब होगा यह सच, या कभी नहीं?

जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है

सामान्य

कुछ अरमान इस दिल के,
तन्हा जीवन से तन्हाई मिटाने के ख़्वाब,
कुछ चाहत उसे पाने की,
थोड़ी आरज़ू उसमे खो जाने की,
कितने हसीन हैं यह सब |

लेकिन साथ है डर इन सबके खो जाने का,
उससे दूर हो जाने का,
जानता नहीं क्या होगा आगे,
पर सोच रूकती कहाँ है, जाती है भागे,
इस रफ़्तार से की पकड़ना मुश्किल है,
उसके साथ चलता तो हूँ
शायद “साथ” में उसके होने की चाहत है,
जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है |

पानी के बेहने को अश्क़ नहीं कहते

सामान्य

दर्द कितना है दिल में न जान पाओगे,
हम रोज़ अपने ग़म का इश्तेहार नहीं करते,
जो आँख से टपकें लहू तो बतायेंगे,
पानी के बेहने को अश्क़ नहीं कहते ॥

आत्मीयता

सामान्य

आत्मीयता एक कोशिश है हिन्दी के साथ मेरे आत्मीय संबंधो को बढाने की और हिन्दी जगत में एक पहचान बनाने की। मैं आप सभी का आशीर्वाद चाहूँगा की मैं कुछ अच्छा और सृजग योगदान कर सकूँ और इस चिट्ठे को हिन्दी के समक्ष निष्ठावान और कारगर सिद्ध कर सकूँ।