Author Archives: Palak Mathur

About Palak Mathur

A proud Indian

With Love to Srishti

सामान्य

आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

छोटी सी थी तुम अब से कुछ दिन पहले तक,
जब छोटी सी बात पर चिन्ता होती थी तुम्हरी,
कहाँ गयी हो या कहाँ हो,
सोच कर हर पल व्याकुलता होती थी,
लेकिन आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

तुम इतनी जल्दी बड़ी होगी,
अन्दाज़ा ना था,
सोचा भी नहीं था,
छोटी सी गुड़िया सी थीं तुम,
जिसे देखकर बड़े होने का एहसास होता था,
लेकिन आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

कुछ दिन रहीं जो तुम साथ में,
बहुत मज़ा आया,
खुश तो आज बहुत हम भी हैं,
दिल में दुआयें बहुत हैं,
मन्न है लेकिन थोड़ा घबराया,
कि आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

आज का दिन कुछ खास है,
कुछ खास ही होगा,
कि तुम्हरी शादी कल और मेहन्दी आज है|

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तन्हाई

सामान्य

चारों और के अंधियारे में

जब मैं छत पर बैठा था अकेला,

दूर तक निहारने कि कोशिश कर रहा था ,

तभी मुझे लगा मेरी आत्मा मुझसे अलग हो

मेरे पास आ बैठी है ,

मेरी तन्हाई में अपने को शामिल करने ,

और शायद कुछ कहने !

जैसे ही वह हुई कुछ कहने ,

कहीं दूर किसी ने एक दीप जला दिया ,

यह सोच कि सुबह के सूरज कि

पहली किरण आ पड़ी है ,

वह मेरे भीतर समां गयी ,

मुझको वहीं छोड़ ,

मेरी तन्हाई में !!

# यह कविता मैने १७ मार्च २००२ को आगरा में खतैना रोड वाले घर में लिखी थी तकरीबन रात को १:२५ प्रात: बजे।

कुछ पोखरण यहाँ भी, कुछ विस्फ़ोट वहां भी

सामान्य

कुछ पोखरण यहाँ भी, कुछ विस्फ़ोट वहां भी,

एटम बम बनाके है खुश यह जहान भी,

जब फटेगा यह बम हमारे आशियाने या तुम्हारे आशियाने में,

चीथड़े उड़ेंगे कुछ यहाँ भी कुछ वहां भी|

आँखें नम होंगी दुनिया में हर इंसान की,

शोक मनाये जायेंगे कुछ यहाँ भी कुछ वहां भी,

एटम बम बनाके है खुश यह जहान भी,

कि फिर होंगे कुछ पोखरण यहाँ भी, कुछ विस्फ़ोट वहां भी ||

तुम्हारा साथ

सामान्य

#प्रीती के लिऐं

#21st Nov 2010 – एक साल साथ निभाने और मुझे झेलने के लिएँ

तेरे मिलने से पहले अधूरी थी हर चीज़,
तेरे आने से पहले न यह रंगत थी।
तुम लाईं ज़िन्दगी में एक नयापन,
पास मेरे अब तेरी संगत थी।

हो रहा है पूर्ण वर्ष साथ चलने का,
नया वर्तमान जीने का, नई ख़्वाहिश करने का,
कुछ रूठने, मनाने, समझने, समझाने का,
कुछ साथ पाने का, कुछ खो जाने का।

एक वर्ष हो रहा है पूर्ण और दूसरा आरम्भ,
कुछ आशायें हैं नयी, कुछ नया होगा प्रारम्भ,
तुम्हारा साथ हो बस यही है आशा,
बस साथ चले हम और हो न कोई निराशा।

तमसो मा ज्योतिर्गमय

सामान्य

#यह कहानी मैने १-अगस्त-२००१ को आगरा में लिखी थी

“तमसो मा ज्योतिर्गमय”

वह दिन आ ही गया। रतनिक को अमेरिका जाना है – “द यू.एस.” – आगे की पढ़ाई के लिए। रतनिक पढ़ाई में होशियार है एवं उसे पढ़ाई के लिए अमेरिका कि एक युनिवर्सिटी वज़ीफ़ा भी दे रही है।

सुबह से ही घर में मिलने वालों का ताँता लगा था। अब थोड़ी देर आराम मिला है सबको। दोपहर के २ बज रहे हैं। रात नॊ बजे की फ़्लाईट है। रतनिक अपने कमरे में खिड़की के सामने बैठा शून्य में निहार रहा है। उसके मन में घर छोड़कर जाने की, माँ, पापा, भईया-भाभी, बहिन से बिछ्ड़ने का ग़म है। वह अन्दर-ही-अन्दर रो रहा है। कभी मन करता है कि काश वह वहीं रुक सकता। लेकिन नहीं, वह नहीं रुक सकता। उसने ही तो ज़िद की थी अमेरिका जाकर आगे पढ़ाई करने की। अब जब मौका मिला है तो वो इसे खोना भी नहीं चाहता।

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कब होगा यह सच, या कभी नहीं?

सामान्य

कब से अरमान ज़िन्दगी के जगा रहा हूँ,
कब से उसे मैं बिन रुके बुला रहा हूँ,
कब से इंतज़ार है उसके आने का,
कब से विचार है उसमें डूब जाने का,
कब से आरज़ू है उसकी आवाज़ में खो जाने की,
कब से चाहत है उसकी चाहत को अपना बनाने की,
कब तक यह रहेगा एक सपना,
कब होगा यह सच, या कभी नहीं?

जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है

सामान्य

कुछ अरमान इस दिल के,
तन्हा जीवन से तन्हाई मिटाने के ख़्वाब,
कुछ चाहत उसे पाने की,
थोड़ी आरज़ू उसमे खो जाने की,
कितने हसीन हैं यह सब |

लेकिन साथ है डर इन सबके खो जाने का,
उससे दूर हो जाने का,
जानता नहीं क्या होगा आगे,
पर सोच रूकती कहाँ है, जाती है भागे,
इस रफ़्तार से की पकड़ना मुश्किल है,
उसके साथ चलता तो हूँ
शायद “साथ” में उसके होने की चाहत है,
जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है |