तमसो मा ज्योतिर्गमय

सामान्य

#यह कहानी मैने १-अगस्त-२००१ को आगरा में लिखी थी

“तमसो मा ज्योतिर्गमय”

वह दिन आ ही गया। रतनिक को अमेरिका जाना है – “द यू.एस.” – आगे की पढ़ाई के लिए। रतनिक पढ़ाई में होशियार है एवं उसे पढ़ाई के लिए अमेरिका कि एक युनिवर्सिटी वज़ीफ़ा भी दे रही है।

सुबह से ही घर में मिलने वालों का ताँता लगा था। अब थोड़ी देर आराम मिला है सबको। दोपहर के २ बज रहे हैं। रात नॊ बजे की फ़्लाईट है। रतनिक अपने कमरे में खिड़की के सामने बैठा शून्य में निहार रहा है। उसके मन में घर छोड़कर जाने की, माँ, पापा, भईया-भाभी, बहिन से बिछ्ड़ने का ग़म है। वह अन्दर-ही-अन्दर रो रहा है। कभी मन करता है कि काश वह वहीं रुक सकता। लेकिन नहीं, वह नहीं रुक सकता। उसने ही तो ज़िद की थी अमेरिका जाकर आगे पढ़ाई करने की। अब जब मौका मिला है तो वो इसे खोना भी नहीं चाहता।

रतनिक के सामने बचपन की सारी बातें एक फ़िल्म की तरह चलने लगीं। उसे याद आने लगा कि कैसे उसके बड़े भाई-बहिन उसे छेड़ा करते थे। उसे याद आने लगा की जब उसे बहुत तेज़ बुखार हुआ था तो कैसे उसकी माँ रात-दिन देखभाल करती थी। उसे अपने दोस्तों के साथ बिताये दिन याद आने लगे। सब ऐसा लगता है जैसे कल ही की बात हो। वह सोच रहा है कि उनका कितना बड़ा ग्रूप था दोस्तों का। सब हमेशा साथ ही रहते थे और पढ़ाई किया करते थे, खेलते थे, मस्ती करते थे। लेकिन इन्टर के बाद सब बिछ्ड़ गए। कोई दिल्ली चला गया, तो किसी ने बैन्ग्लोर में दाखिला ले लीया, तो कोई कहीं और चला गया। रतनिक की आँखों से आँसू छ्लकने लगे। उसका मन तो बहुत हुआ की पोंछ ले, लेकिन उसके हाँथों ने साथ नहीं दिया। आँसू बहते हुए उसके होंठों तक पहुँच गये। उसने होंठों पर जीभ फेरी। आँसू नमकीन थे।

किसी ने कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। रतनिक एक दम चौक गया। उसने अपने आँसू पहुँचे और दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़े पर उसकी भाभी खड़ीं थी। भाभी ने पूछा, “रतनिक सो रहे थे क्या? कब से दरवाज़ा खटखटा रही थी।”

रतनिक बोला, “नहीं भाभी! बस यूँहीं।”

भाभी ने कहा, “रतनिक, कोई उलझन है क्या? सुबह से तुम किसी सोच में डूबे हो। क्या अमेरिका जाने की खुशी नहीं है?”

रतनिक बोल पड़ा, “नहीं भाभी, ऐसी बात नहीं है।”

“तो कैसी बात है?”, भाभी ने फ़ट से पूछ लिया।

रतनिक थोड़ी देर चुप रहा। भाभी फ़िर बोली, “बताओ अगर कोई समस्या है, तो मैं तुम्हारी शायद मदद कर सकूँ। मुझे क्या अपना नहीं समझते? या मैं नई हूँ इसलियें बताने में झिझक रहे हो?”

“ऐसी बात नहीं है भाभी।” रतनिक रो पड़ता है और अपने दिल की बात भाभी को बता देता है।

भाभी रतनिक को समझाते हुए कहती हैं, “रतनिक, देखो यह तो अच्छी बात है कि तुम हम सबसे इतना प्रेम रखते हो। लेकिन जीवन यहीं तक सीमित नहीं है। तुम्हे आगे बड़ना है। हम सबकी आशायें तुम पर हैं। तुम कया सोचते हो कि तुम्हारे जाने से हमें अच्छा लगेगा? तुम्हारी बिन खाली-खाली हो जायेगा। एकदम सूना। लेकिन हमें यह भी पता है कि तुम वापिस आओगे, इस काबिल बन कर कि हमें तुम पर गर्व होगा। बस इसी खुशी की चाह में हम तुम्हें अपने से दूर कर रहे हैं। लेकिन तुम हमसे दूर कहाँ होगे, तुम्हारी जगह तो हमारे दिल में है। अब तो ई-मेल और चैटिंग के ज़रिए हम तुम्हारी रोज़ खबर लेते रहेंगे”, भाभी इतना कह कर चुप हो जातीं हैं। उनकी आँखें नम हो जाती हैं।

रतनिक कुछ नहीं बोला। एकदम सन्नाटा छा जाता है। बस सड़्क पर गुज़र रहे वाहन कभी खामोशी को चीरते हुए निकल जाते हैं। सहसा ही भाभी की नज़र घड़ी पर पड़ती है। चार बजे हैं। भाभी रतनिक को तैयार होने के लिए कहकर चली जातीं हैं।

बलराम सारा सामान कार की डिक्की में रख देता है। रतनिक सबके पैर छू कर कार में बैठ पिछ्ली सीट पर बैठ जाता है। साथ में माँ और भाभी भी बैठती हैं। पापा आगे भईया के साथ बैठते हैं। माँ रतनिक को समझाती हैं कि अपना ध्यान रखना। पापा कहते हैं, “रोमिका तुम्हें लेने एयरपोर्ट पर पहुँचेगी। वैसे तो सब इन्तज़ाम हो गए हैं, फ़िर भी अगर ज़रूरत हो तो फ़ोन कर देना या रोमिका से कह देना।”

रतनिक सिर्फ़ “जी” कह पाता है और अपनी ही दुनिया में खो जाता है।

एयरपोर्ट पर सभी “फ़ार्मालिटिज़” पूरी करने के बाद सब एक तरफ़ खड़े होकर बातें करते रहते हैं। सब रतनिक को  समझाते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं। लेकिन वोह कुछ सुन ही नहीं रहा। वह तो बस जाने से पहले सबको आँखों में बसा लेना चाहता है।

तभी घोषणा होती है, “दिस इज़ दी लास्ट एनाउन्समेन्ट फ़ॊर पैसेन्जर्स ट्रैवेलिन्ग बाइ एयर-इन्डिया फ़्लाईट नम्बर आई.सी. १३०८ टू न्यू यॊर्क। पैसेनजर्स आर रिकुएस्टेड टू प्लीज़ प्रोसीड फ़ोर द प्लेन फ़्रॊम गेट नम्बर ५।”

रतनिक के कदम अपने आप ही प्लेन की तरफ़ बड़ने लगते हैं। वह चाहकर भी रुक नहीं पाता। सबकी आँखें नम हो जाती हैं। लेकिन फिर भी उसे निहारती रहती हैं। रतनिक प्लेन में चढ़ता है। प्लेन का दरवाज़ा बन्द होता है। सीढ़ी हटा ली जाती है और हवाई जहाज़ हवाई-पट्टी पर कुछ दूर दौड़ता है और फिर एकदम उड़ जाता है। लेकिन सबकी निगाहें जहाज़ पर टिकी रहती हैं जब तक की जहाज़ दूर बादलों में ओझल नहीं हो जाता। सब कुछ देर शून्य में निहारते रहते हैं।

रतनिक सोचता है कि वह अमेरिका में अपना और अपने घरवालों का खूब नाम रौशन करेगा। वह यह सोच ही रहा  होता है कि एक एयर-हॊस्टेस आकर पूछ्ती है, “सर! वुड यू लाईक टू हैव ऎनीथिन्ग?”

रतनिक बिना कुछ सुने ही मुस्कुराते हुए मूँह हिला कर मना कर देता है। उसके कानों में तो भाभी की बात गूँज रही हैं। उसे लगता है कही दूर किसी पहाड़ी पर मंदिर की घंटीयाँ बज रही हैं व कह रही हैं,
“तमसो मा ज्योतिर्गमय!”

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