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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कब से अरमान ज़िन्दगी के जगा रहा हूँ,
कब से उसे मैं बिन रुके बुला रहा हूँ,
कब से इंतज़ार है उसके आने का,
कब से विचार है उसमें डूब जाने का,
कब से आरज़ू है उसकी आवाज़ में खो जाने की,
कब से चाहत है उसकी चाहत को अपना बनाने की,
कब तक यह रहेगा एक सपना,
कब होगा यह सच, या कभी नहीं?

कुछ अरमान इस दिल के,
तनहा जीवन से तन्हाई मिटाने के ख़्वाब,
कुछ चाहत उसे पाने की,
थोड़ी आरज़ू उसमे खो जाने की,
कितने हसीन हैं यह सब |

लेकिन साथ है डर इन सबके खो जाने का,
उससे दूर हो जाने का,
जानता नहीं क्या होगा आगे,
पर सोच रूकती कहाँ है, जाती है भागे,
इस रफ़्तार से की पकड़ना मुश्किल है,
उसके साथ चलता तो हूँ
शायद “साथ” में उसके होने की चाहत है,
जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है |

दर्द कितना है दिल में न जान पाओगे,
हम रोज़ अपने ग़म का इश्तेहार नहीं करते,
जो आँख से टपकें लहू तो बतायेंगे,
पानी के बेहने को अश्क़ नहीं कहते ॥

आज फिर वोह याद आये हैं,
आँखों में मेरे आँसू लाये हैं,
काश ऐसा हो कर दें वोह मुझको माफ़,
आ जायें मेरी बाहों में ऐसा हो इन्साफ़!!

चाहत

मजबूरी और बेबसी का जो है आलम,
निजात उससे पाने की चाहत है,
इंसानों को अब इंसानियत की है ज़रुरत,
बस उनको यह समझाने की चाहत है |

की चाहतें तो हजारों पाल बैठे हैं,
पर न पता किस चाहत की हमसे क्या चाहत है,
की भूल बैठे ज़माना खुशियों का,
न जाने ग़मों को हमसे इतनी क्या चाहत है ||

चाहते तो हम भी थे चाहतों की हद्द तक,
पर न जाने क्यूँ चाहतों को हदों में सिमटने की चाहत है,
सिमटने से रोका काफी बार इन चाहतों को,
न जाने क्यूँ इन्हें शर्मा जाने की चाहत है |

पर हम भी नहीं आशिक कच्चे उनके,
कर देंगे उन्हें बेपर्दा, भले उन्हें इज्ज़त से चाहत है,
हम नहीं छोडेंगे चाहत उनकी,
हमें उनकी चाहत को अपना बनाने की चाहत है ||

समय की धरा पर हूँ मैं यूं चल रहा,जिस तरह पंछी उड़ रहे गगन में, विचारों का समूह है यूं उमड़ रहा, जिस तरह बादल गरज रहे आसमान मे | आते हैं विचार अक्सर उन्मुक्त स्वप्न में,खो जाते हैं बरबस हम अपनी लगन में, ले आयेंगे नव भोर हम रात्री प्रहार मे, फिर चमकेगा सूर्य स्वछन्द नीले गगन मे ||

हुकुम ख़ुदा का माने, या सियासी मेहरबानों का, 
गर्दिश में तारे हिन्दोस्तान के नज़र आते हैं,
या माने उनकी जो खुद फ़नाह हुए,
जो आजकल ख्वाबों में नज़र आते हैं |

होली

रंगों के इस पावन पर्व पर,
आओ अपने जीवन में रंग नए बिखेरें हम,
और जीवन के आँगन में रंगोली एक बनाएं,
करें कामना यह की
जीवन हमारा सदैव ही रंगों की तरह मुस्कुराता रहे,
और ‘पलक’ कभी ग़म के आंसूओं से न भीगे!

नाराज़गी

ज़िंदगी से रंजिश है मेरी,

क्यों है न जानता हूँ मैं,

खुशी आती है पल भर के लिए,

बैठती ही नहीं है साथ मेरे,

न जाने किस बात की नाराज़गी है,

न समझ पाता हूँ मैं !!!

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