तन्हाई

तन्हाई

चारों और के अंधियारे में

जब मैं छत पर बैठा था अकेला,

दूर तक निहारने कि कोशिश कर रहा था ,

तभी मुझे लगा मेरी आत्मा मुझसे अलग हो

मेरे पास आ बैठी है ,

मेरी तन्हाई में अपने को शामिल करने ,

और शायद कुछ कहने !

जैसे ही वह हुई कुछ कहने ,

कहीं दूर किसी ने एक दीप जला दिया ,

यह सोच कि सुबह के सूरज कि

पहली किरण आ पड़ी है ,

वह मेरे भीतर समां गयी ,

मुझको वहीं छोड़ ,

मेरी तन्हाई में !!

# यह कविता मैने १७ मार्च २००२ को आगरा में खतैना रोड वाले घर में लिखी थी तकरीबन रात को १:२५ प्रात: बजे।

कुछ पोखरण यहाँ भी, कुछ विस्फ़ोट वहां भी

कुछ पोखरण यहाँ भी, कुछ विस्फ़ोट वहां भी

कुछ पोखरण यहाँ भी, कुछ विस्फ़ोट वहां भी,

एटम बम बनाके है खुश यह जहान भी,

जब फटेगा यह बम हमारे आशियाने या तुम्हारे आशियाने में,

चीथड़े उड़ेंगे कुछ यहाँ भी कुछ वहां भी|

आँखें नम होंगी दुनिया में हर इंसान की,

शोक मनाये जायेंगे कुछ यहाँ भी कुछ वहां भी,

एटम बम बनाके है खुश यह जहान भी,

कि फिर होंगे कुछ पोखरण यहाँ भी, कुछ विस्फ़ोट वहां भी ||

तुम्हारा साथ

तुम्हारा साथ

#प्रीती के लिऐं

#21st Nov 2010 – एक साल साथ निभाने और मुझे झेलने के लिएँ

तेरे मिलने से पहले अधूरी थी हर चीज़,
तेरे आने से पहले न यह रंगत थी।
तुम लाईं ज़िन्दगी में एक नयापन,
पास मेरे अब तेरी संगत थी।

हो रहा है पूर्ण वर्ष साथ चलने का,
नया वर्तमान जीने का, नई ख़्वाहिश करने का,
कुछ रूठने, मनाने, समझने, समझाने का,
कुछ साथ पाने का, कुछ खो जाने का।

एक वर्ष हो रहा है पूर्ण और दूसरा आरम्भ,
कुछ आशायें हैं नयी, कुछ नया होगा प्रारम्भ,
तुम्हारा साथ हो बस यही है आशा,
बस साथ चले हम और हो न कोई निराशा।

तमसो मा ज्योतिर्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

#यह कहानी मैने १-अगस्त-२००१ को आगरा में लिखी थी

“तमसो मा ज्योतिर्गमय”

वह दिन आ ही गया। रतनिक को अमेरिका जाना है – “द यू.एस.” – आगे की पढ़ाई के लिए। रतनिक पढ़ाई में होशियार है एवं उसे पढ़ाई के लिए अमेरिका कि एक युनिवर्सिटी वज़ीफ़ा भी दे रही है।

सुबह से ही घर में मिलने वालों का ताँता लगा था। अब थोड़ी देर आराम मिला है सबको। दोपहर के २ बज रहे हैं। रात नॊ बजे की फ़्लाईट है। रतनिक अपने कमरे में खिड़की के सामने बैठा शून्य में निहार रहा है। उसके मन में घर छोड़कर जाने की, माँ, पापा, भईया-भाभी, बहिन से बिछ्ड़ने का ग़म है। वह अन्दर-ही-अन्दर रो रहा है। कभी मन करता है कि काश वह वहीं रुक सकता। लेकिन नहीं, वह नहीं रुक सकता। उसने ही तो ज़िद की थी अमेरिका जाकर आगे पढ़ाई करने की। अब जब मौका मिला है तो वो इसे खोना भी नहीं चाहता।

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कब होगा यह सच, या कभी नहीं?

कब होगा यह सच, या कभी नहीं?

कब से अरमान ज़िन्दगी के जगा रहा हूँ,
कब से उसे मैं बिन रुके बुला रहा हूँ,
कब से इंतज़ार है उसके आने का,
कब से विचार है उसमें डूब जाने का,
कब से आरज़ू है उसकी आवाज़ में खो जाने की,
कब से चाहत है उसकी चाहत को अपना बनाने की,
कब तक यह रहेगा एक सपना,
कब होगा यह सच, या कभी नहीं?

जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है

जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है

कुछ अरमान इस दिल के,
तन्हा जीवन से तन्हाई मिटाने के ख़्वाब,
कुछ चाहत उसे पाने की,
थोड़ी आरज़ू उसमे खो जाने की,
कितने हसीन हैं यह सब |

लेकिन साथ है डर इन सबके खो जाने का,
उससे दूर हो जाने का,
जानता नहीं क्या होगा आगे,
पर सोच रूकती कहाँ है, जाती है भागे,
इस रफ़्तार से की पकड़ना मुश्किल है,
उसके साथ चलता तो हूँ
शायद “साथ” में उसके होने की चाहत है,
जिसकी चाहत मेरा ख़्वाब है |

पानी के बेहने को अश्क़ नहीं कहते

पानी के बेहने को अश्क़ नहीं कहते

दर्द कितना है दिल में न जान पाओगे,
हम रोज़ अपने ग़म का इश्तेहार नहीं करते,
जो आँख से टपकें लहू तो बतायेंगे,
पानी के बेहने को अश्क़ नहीं कहते ॥

आज फिर वोह याद आये हैं

आज फिर वोह याद आये हैं

आज फिर वोह याद आये हैं,
आँखों में मेरे आँसू लाये हैं,
काश ऐसा हो कर दें वोह मुझको माफ़,
आ जायें मेरी बाहों में ऐसा हो इन्साफ़!!

चाहत

चाहत

मजबूरी और बेबसी का जो है आलम,
निजात उससे पाने की चाहत है,
इंसानों को अब इंसानियत की है ज़रुरत,
बस उनको यह समझाने की चाहत है |

की चाहतें तो हजारों पाल बैठे हैं,
पर न पता किस चाहत की हमसे क्या चाहत है,
की भूल बैठे ज़माना खुशियों का,
न जाने ग़मों को हमसे इतनी क्या चाहत है ||

चाहते तो हम भी थे चाहतों की हद्द तक,
पर न जाने क्यूँ चाहतों को हदों में सिमटने की चाहत है,
शर्माने से रोका काफी बार इन चाहतों को,
न जाने क्यूँ इन्हें सिमट जाने की चाहत है |

फिर चमकेगा सूर्य स्वछन्द नीले गगन मे

फिर चमकेगा सूर्य स्वछन्द नीले गगन मे
समय की धरा पर हूँ मैं यूं चल रहा,जिस तरह पंछी उड़ रहे गगन में,
विचारों का समूह है यूं उमड़ रहा, जिस तरह बादल गरज रहे आसमान मे |

आते हैं विचार अक्सर उन्मुक्त स्वप्न में,खो जाते हैं बरबस हम अपनी लगन में,
ले आयेंगे नव भोर हम रात्री प्रहार मे, फिर चमकेगा सूर्य स्वछन्द नीले गगन मे ||